स्वामी ग्रह: केतु
मूल नक्षत्र
संक्षेप में
मूल नक्षत्र क्या है?
मूल 27 नक्षत्रों में से एक है, जो निरयण राशिचक्र के 240°00′–253°20′ में फैला है और धनु में पड़ता है। इसके स्वामी केतु हैं, गण राक्षस, नाड़ी आदि और योनि श्वान है।
मूल नक्षत्र। किसी बात की तह तक जाने और नींव खोदने से होने वाली उथल-पुथल से जुड़ा।
- स्वामी ग्रह
- केतु
- राशिचक्र में विस्तार
- 240°00′ – 253°20′
- राशि
- धनु
- पाद
- 4 × 3°20′
- गण
- राक्षस
- नाड़ी
- आदि
- योनि
- श्वान
- प्रतीक
- जड़ों का गुच्छा
- देवता
- निरृति
- विंशोत्तरी दशा
- केतु · 7 वर्ष
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
मूल नक्षत्र क्या है?
मूल 27 नक्षत्रों में से एक है, जो निरयण राशिचक्र के 240°00′–253°20′ में फैला है और धनु में पड़ता है। इसके स्वामी केतु हैं, गण राक्षस, नाड़ी आदि और योनि श्वान है।
मूल नक्षत्र का स्वामी ग्रह कौन है?
केतु। इसी स्वामित्व के कारण मूल में जन्मे व्यक्ति का जीवन केतु की महादशा से आरम्भ होता है, जो विंशोत्तरी चक्र में 7 वर्ष चलती है।
मूल किस राशि में पड़ता है?
धनु। नक्षत्र 13°20′ का होता है और राशि 30° की, इसलिए अधिकांश नक्षत्र किसी एक राशि में पूरी तरह न बैठकर सीमा पार करते हैं।
मूल का गण और नाड़ी क्या है?
मूल का गण राक्षस और नाड़ी आदि है। दोनों अष्टकूट मिलान में प्रयोग होते हैं — गण छह अंकों का और नाड़ी आठ अंकों की।
मूल की योनि क्या है?
श्वान। योनि कूट दो जन्म नक्षत्रों को दिए गए पशुओं की तुलना करता है और 36 में से चार अंकों का है।
मूल में कितने पाद होते हैं?
चार, हर नक्षत्र की तरह। हर पाद 3°20′ का होता है, जिससे पूरे राशिचक्र में 108 पाद बनते हैं।