स्वामी ग्रह: गुरु (बृहस्पति)
पुनर्वसु नक्षत्र
संक्षेप में
पुनर्वसु नक्षत्र क्या है?
पुनर्वसु 27 नक्षत्रों में से एक है, जो निरयण राशिचक्र के 80°00′–93°20′ में फैला है और मिथुन, कर्क में पड़ता है। इसके स्वामी गुरु (बृहस्पति) हैं, गण देव, नाड़ी आदि और योनि मार्जार है।
वापसी का नक्षत्र। नवीकरण, दूसरे अवसर और खोई हुई वस्तु की पुनःप्राप्ति से जुड़ा।
- स्वामी ग्रह
- गुरु (बृहस्पति)
- राशिचक्र में विस्तार
- 80°00′ – 93°20′
- पाद
- 4 × 3°20′
- गण
- देव
- नाड़ी
- आदि
- योनि
- मार्जार
- प्रतीक
- तूणीर
- देवता
- अदिति
- विंशोत्तरी दशा
- गुरु (बृहस्पति) · 16 वर्ष
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पुनर्वसु नक्षत्र क्या है?
पुनर्वसु 27 नक्षत्रों में से एक है, जो निरयण राशिचक्र के 80°00′–93°20′ में फैला है और मिथुन, कर्क में पड़ता है। इसके स्वामी गुरु (बृहस्पति) हैं, गण देव, नाड़ी आदि और योनि मार्जार है।
पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी ग्रह कौन है?
गुरु (बृहस्पति)। इसी स्वामित्व के कारण पुनर्वसु में जन्मे व्यक्ति का जीवन गुरु (बृहस्पति) की महादशा से आरम्भ होता है, जो विंशोत्तरी चक्र में 16 वर्ष चलती है।
पुनर्वसु किस राशि में पड़ता है?
मिथुन, कर्क। नक्षत्र 13°20′ का होता है और राशि 30° की, इसलिए अधिकांश नक्षत्र किसी एक राशि में पूरी तरह न बैठकर सीमा पार करते हैं।
पुनर्वसु का गण और नाड़ी क्या है?
पुनर्वसु का गण देव और नाड़ी आदि है। दोनों अष्टकूट मिलान में प्रयोग होते हैं — गण छह अंकों का और नाड़ी आठ अंकों की।
पुनर्वसु की योनि क्या है?
मार्जार। योनि कूट दो जन्म नक्षत्रों को दिए गए पशुओं की तुलना करता है और 36 में से चार अंकों का है।
पुनर्वसु में कितने पाद होते हैं?
चार, हर नक्षत्र की तरह। हर पाद 3°20′ का होता है, जिससे पूरे राशिचक्र में 108 पाद बनते हैं।